दिवाली : तब और अब

आ गई फिर से दिवाली अब दीप जलेंगें..
सबके चेहरे एक बार फिर से खुशियों से खिलेंगे..
लेकिन आज मैं आपको एक राज बतलाता हूं..
पहले की और अब की दिवाली में अंतर बताता हूं..
पहले की दिवाली कुछ यूं मनाई जाती थी..
अपने घर के साथ सारी गली सजाई जाती थी..
चारों ओर मिट्टी के दीप जगमगाते थे..
सारे मिलकर एक साथ दिवाली मनाते थे..
पटाखे फुलझड़ियां मिलकर जलाते थे..
अनार चक्करी सारी रात जगमगाते थे..
अब आज की दिवाली की बात बताता हूँ..
जो बदलाव आया वो समझाता हूँ..
अब बस एक अपना घर सजाते हैं..
चाइनीज सामान से अपना घर जगमगाते हैं..
मिट्टी के दियों से जो दूसरों के घरों में रोशनी उतारते हैं..
वो खुद की रात अंधेरे में गुजारते हैं..
सड़क पर चलती लड़की में फुलझड़ी नजर आती है..
पड़ोस वाली भाभी आजकल बम पटाखा कहलाती है..
सुधर जा ए जमाने वरना खुद से नजरें ना मिला पाएगा..
मनीष इस से आगे अब कलम ना हिला पाएगा..

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