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Showing posts from June, 2018

मां बेटी : एक व्यथा

जब पैदा हुई वो सब ने दुत्कारा था.. वो मां की ममता ही थी जिसने उसको पुचकारा था.. ना बाप ने ना दादी ने देखने तक की जहमत उठाई.. बेटी पैदा होने की सुनते ही उनकी उम्मीद डगमगाई.. देख रहे थे वो बेटे का सपना.. जिसे कहते छाती से लगाकर वो अपना.. बेटी पैदा हुई तो उनके चेहरे उतर गए.. उनके सारे अरमान अंदर ही मर गए.. अब पैदा हो गई तो पालना तो था ही.. उसे आज के माहौल में ढालना तो था ही.. मां ने सबके तानों को सहते उसे पाला था.. अपनी परेशानी भुलाकर उसको संभाला था.. नहलाती खिलाती उसके लाड लडाती.. उसकी भी तमन्ना थी कि अपनी बेटी को पढाती.. भेजने लगी उसे स्कूल सबके उपर से होकर.. उसको हंसाती खुद सारी रात रोकर.. उनकी हंसी भी जमाने को पसंद ना आई.. इंसानी भेड़ियों ने अपनी गंदी नजरें उस पे जमाई.. डरी डरी रहने लगी अब वो स्कूल आते जाते.. अचानक उठ जाती थी खाना खाते खाते.. जैसे तैसे उसने स्कूल पूरा कर लिया.. इसके बाद पैर काॅलेज में धर लिया.. सोचा था पढेगी लिखेगी आगे बढेगी.. अपनी मां के हर सपने को पूरा करेगी.. लेकिन हवस के दरिंदों ने उसे वहां भी नहीं छोड़ा.. उस फूल सी बेटी को एक एक ने निचोड...

मोबाईल

कितना अच्छा था सब, जब मोबाईल ना था.. किसी का ना कोई फैशन और कोई हेयरस्टाइल ना था.. अनजाने को तब यूं ही दोस्त बना लेते थे.. साथ बैठ कर सुख दुख की बतिया लेते थे.. खुशी की खबर घर जाकर सुनाकर आते थे.. एक साथ बैठकर खुशी के गीत गाते थे.. बड़े छोटे का लिहाज होता था.. आंखों में शर्म का ताज होता था.. बहन बेटी की हर कोई इज्जत करता था.. बाप की इज्जत खोने से हर युवा डरता था.. बड़े बड़े झगड़े भी आपस में पंचायत में सुलझाए जाते थे.. भूलकर सारे द्वेष एक दूसरे को गले लगाते थे.. शाम को चौपाल चबूतरों पे हुक्का गुड़गुड़ाता था.. एक बुजुर्गों का झुण्ड दिनभर की थकान भूलकर आपस में खिलखिलाता था.. देश सेवा का जज्बा हर युवा में होता था.. हर युवा सेना में भर्ती होने के सपने संजोता था.. छोटे बच्चों की तो एक अलग ही मस्ती होती थी.. संतरे की टाॅफी तब बहुत सस्ती होती थी.. इनकी टोली बहुत उधम मचाती थी.. अपने बच्चों को देख मां मंद मंद मुस्काती थी.. इनको अपनी मस्ती से मतलब था ना किसी की कोई परवाह थी.. सब चिंताओं से दूर इनकी एक अलग ही दुनिया थी.. जबसे मोबाईल आया सब कुछ बदल गया.. उस हंसती खेलती दुनि...

हर कोई मुझे बीच में क्यों छोड़ जाता है

हर कोई मुझे बीच में क्यों छोड़ जाता है सारे रिश्ते नाते एक पल में तोड़ जाता है.. कोई क्यों किसी को बीच में छोड़ जाता है.. मैं भी ऐसे ही कई बार छोड़ा गया हूँ.. अपनों द्वारा कई बार तोड़ा गया हूँ.. शुरूआत पिताजी ने की हमें छोड़ने की.. 20 जुलाई 2008 की वो मनहूस घड़ी थी हमें तोड़ने की.. बीच राह में छोड़ के खुद तो चल गए हमसे बहुत दूर..  खुद हंसते हुए गए हमें कर गए रोने पे मजबूर..  पिताजी के बाद अपनों ने भी छोड़ दिया साथ..  गिरते को बचाने के लिए नहीं दिया किसी ने हाथ..  खैर मां ने हमको गले से लगाया था..  पिताजी के बाद अपना हर सुख हम में ही पाया था..  जितना कर सकती थी उस से ज्यादा किया..  हमें जो चाहिए था तुरन्त ला कर दिया..  दुनिया बातें बनाती रहती थी..  बिन बाप के बेटों और विधवा मां को जली कटी सुनाती रहती थी..  सबकी सुन कर भी अनजान बनी रहती थी..  मेरी मां हमारे लिए ढाल बनी रहती थी..  दुनिया की सुन कर मैं पिसता रहता था..  रातों को एक झरना आंखों से रिसता रहता था..  रिश्तेदार भी छोड़...

उतार चढ़ाव

        *उतार चढ़ाव* तुझे शिखर पे चढ़ाकर मैं धरती पर उतर गया.. तुझे खुश करने को मैं सब कुछ कर गया.. तुझे जीना सिखा के खुद मरना सीख गया.. तुझे हंसा के खुद आंसुओं में भीग गया.. तुझे बड़ा करके खुद बच्चा बन गया.. अब तु रखेगा ख्याल मेरा सोच के अक्ल का कच्चा बन गया.. तुझे आगे बढ़ाकर खुद हो गया पीछे.. एक एक पल याद है जो गुजारा तेरी जुल्फों के नीचे.. तुझे समझदार बनाकर खुद पागल बन गया.. तेरी तरक्की से मेरा भी सीना तन गया.. तुझमें हिम्मत भरके खुद कायर बन गया.. तुझसे दूर होने के अहसास से ही डर गया.. तुझे सम्भलना सिखाकर खुद गिर गया.. उल्टे सीधे ख्यालों से मेरा दिमाग फिर गया.. हमेशा तेरा सोच कर अपना सब कुछ भूल गया..  तेरी खातिर हंसते हंसते तुझमें हो मशगूल गया..  लेकिन जब तुने छोड़ा सारे सपने टूट गए..  "मनीष" से अब सारे अपने रूठ गए..  अब "मनीष" इतना टूट गया कि जुड़ ना पाएगा..  वापस चार साल पहले मुड़ ना पाएगा.. 

आज आंखों में एक नमी सी है..

आज आंखों में एक नमी सी है.. किसी अपने की कमी सी है.. बार बार आ रहा है वो याद.. उस से मिलने की मैं कर रहा हूं फरियाद.. हर कोशिश कर ली हर दरवाजा खटखटा लिया.. खुद को पागल प्रेमी बना लिया.. आंख रो रो कर हो गई है लाल.. उस बेखबर को नहीं है मेरा कोई ख्याल.. 2 रात से नहीं सोया हूँ.. उसके लिए सारी रात रोया हूँ.. मन में आस है वापस आएगा.. मुझे अपना कहकर गले से लगाएगा.. प्यार में ऐसी सजा मिलेगी सोचा ना था.. खुद को प्यार करने से पहले एक पल भी रोका ना था.. उसको ही अपना माना पलकों पे बिठाया.. जिसने मुझे आज इस कद्र रुलाया.. ना खुद का कोई होश है ना ख्याल है.. उसकी याद में हो गया बुरा हाल है.. मैने तो प्यार किया था आखिरी सांस तक निभाऊंगा.. उसकी नफरत के साथ ना जिंदा रह पाऊंगा.. 

सुधार

कदम सुधार के कुछ सुधर गया है कुछ और सुधर जाएगा.. मनीष अब तेरे सपनों का राजकुमार बन के दिखाएगा.. वो सब करेगा जो तुने चाहा है.. लेकिन मनीष ने अपना सब कुछ तुझमें ही पाया है.. आगे पढेगा भी आगे बढेगा भी और एक नया मुकाम पाएगा.. गर रहा तेरा साथ हमेशा तो हर मुश्किल से टकरा जाएगा.. तेरे सपनों को भी नई उड़ान दिलवाएगा.. बनाकर डाक्टर तुझे एक नई पहचान दिलवाएगा.. तेरे दुख मेरे होंगे मेरे सुख तेरे.. इसी वचन के साथ लेगा सात फेरे.. तेरी हर बात ऊपर रहेगी.. मान लेगा वही जो जो तु कहेगी.. घर के हर काम में बराबर का हाथ बटाएगा.. पूरी जिंदगी तेरा साथ निभाएगा.. कभी गुस्सा नही करेगा ना तुझपे हाथ उठाएगा.. तुझे रोज अपने हाथों से खाना खिलाएगा.. ना पहुंचने देगा तेरे आत्म-सम्मान को ठेस कभी.. एक आखिरी मौका देकर देख अभी.. तु तो वो हीरा है जिसे ये नासमझ पहचान ना पाया.. बेवजह के घमंड में तुझको गंवाया.. जो ना करे तेरी इज्जत उस से मेरा भी कोई रिश्ता नहीं.. गर होता थोड़ा भी इल्म इस घड़ी का तो आज बेवजह यूं पिसता नहीं.. जब जब जिस रिश्ते की तुझे जरूरत होगी वही बन जाएगा.. बनकर तेरा भाई, बाप, बेटा उनकी ...

अभी के हालात

अभी के हालात ना कुछ चाह रह गया है ना कोई रंग रह गया है.. मनीष अब सिर्फ एक कटी पतंग रह गया है.. जिसका ना कोई पता ना ठिकाना है.. बस कहीं दूर जाके किसी पेड़ में अटक के तबाह हो जाना है.. दुनिया से एकदम अलग थलग हो गया है.. उसका नसीब कहीं जाके सो गया है.. ना किसी से कुछ बात करता है ना बोलता है.. कभी-कभी बस " I MISS YOU " कहने को मुह खोलता है.. पड़ा रहता है सबसे अलग एक कोने में.. लगा रहता है रोने में जब दुनिया व्यस्त होती है सोने में.. कभी इस दीवार को तो कभी उस दीवार को निहारता है.. रात में अकेला अपने प्यार को पुकारता है.. कभी चुप हो जाता है कभी रोने लगता है.. कभी अपने प्यार के ख्यालों में खोने लगता है.. खुद को गालियाँ देता है कोसता रहता है.. क्यूँ की इतनी बड़ी गलती सोचता रहता है.. ना ढंग से खा रहा है ना पी रहा है.. अपने प्यार के इंतजार में बस जी रहा है.. मरने की सोचता है पर रुक जाता है.. उसका रोता चेहरा आँखों के सामने आने पर हलक सूख जाता है.. जिसका एक फोटो भी कटने पर देता था रो.. हाल का अन्दाजा लगा लो जब उसको दिया खो.. कोशिश की एक दिन चले जाने की.. नाकाम ह...

नाकाम कोशिश

नाकाम कोशिश.. जान देने की एक और कोशिश नाकाम हो गई.. मैं तड़पता रहा सारी रात मेरी किस्मत सो गई.. दिन में गया था मिलने कि हाल-ए-दिल तमाम बताऊंगा.. कहीं ले जाकर उसको अच्छे से प्यार का अहसास कराऊंगा.. इंतजार किया उसका बाहर आने का.. उसको एक बार फिर से जिन्दगी में लाने का.. खड़ा रहा आधा घंटा धुप में.. शायद कुछ पाप कम हो जाएं पसीने से सूख के.. वो आया बाहर देख के अनदेखा कर गया.. मैं उसी वक्त आधा और मर गया.. चल दिया पीछे पीछे लिम्का हाथ में लिए.. अपने प्यार का पैगाम साथ में लिए.. मैंने पूछा उसे कुछ पीने के लिए.. देने को आखिरी मौका जीने के लिए.. कुछ ना बोला वो बस चलता रहा.. उसका अनदेखापन मुझे रह रह के खलता रहा.. फिर मैंने उसे प्यार का गुस्सा दिखलाया.. वो उसी पुराने वाले अन्दाज में मुस्कुराया.. आंखों में देखा उसकी वही पुराना प्यार था.. फिर भी पता नहीं क्यों उसे इस से इंकार था.. आंखों से पता चला बहुत रोया है.. मैंने एक बेशकीमती हीरा खोया है.. फिर मैंने हाथों में हाथ लेना चाहा.. उसने झटक के अपना हाथ छुड़ाया.. कभी पास होने का अहसास करवाता था जो दूर होके भी.. आज पास होने प...

40 दिन का जहर

   40 दिन का जहर 2 अप्रैल का दिन ऐसा आया था.. जिसने मुझे अन्दर तक हिलाया था.. मन में एक नया उत्साह था.. नई नई नौकरी का चाह था.. घर से निकला था एक नए रंग के साथ.. अपनों से दूर जाने के गम के साथ.. एक अपना ऐसा भी था जो मेरे साथ था.. दूर होने पर भी जिसके हाथों में हाथ होने का अहसास था.. जैसे तैसे कुछ वक्त फिसल गया.. उस एक अपने के सहारे एक सप्ताह निकल गया.. फिर वो दिन आया.. जो मेरी जिंदगी में तुफान लाया.. एक ऐसा तुफान जिसने ना कोई शोर मचाया.. लेकिन मेरी जिंदगी में कोहराम घनघोर मचाया.. उस अपने के हाथों से हाथ छुटता दिखाई दे रहा था.. और वक्त एक नासमझ सी करवट ले रहा था.. गलती मेरी थी मैं कुछ ज्यादा बोल गया.. उसकी हालत देखे बिना नासमझी में मुह खोल गया.. मैं सप्ताह बाद घर पे था.. मगर ध्यान अभी भी उस अपने में था.. बराबर गुरुर दोनों ओर था.. जिसका ना कहीं शोर था.. ना वो बोला ना मैने बोलने की जहमत उठाई.. बस यहीं से मैने अपनी सारी खुशियां गंवाई.. दोनों तरफ दिल में उथल पुथल चल रही थी.. एक दूसरे की कमी दोनों तरफ खल रही थी.. अब मुझपे दोहरी मार थी.. एक तरफ उसकी कमी ...