मां बेटी : एक व्यथा
जब पैदा हुई वो सब ने दुत्कारा था.. वो मां की ममता ही थी जिसने उसको पुचकारा था.. ना बाप ने ना दादी ने देखने तक की जहमत उठाई.. बेटी पैदा होने की सुनते ही उनकी उम्मीद डगमगाई.. देख रहे थे वो बेटे का सपना.. जिसे कहते छाती से लगाकर वो अपना.. बेटी पैदा हुई तो उनके चेहरे उतर गए.. उनके सारे अरमान अंदर ही मर गए.. अब पैदा हो गई तो पालना तो था ही.. उसे आज के माहौल में ढालना तो था ही.. मां ने सबके तानों को सहते उसे पाला था.. अपनी परेशानी भुलाकर उसको संभाला था.. नहलाती खिलाती उसके लाड लडाती.. उसकी भी तमन्ना थी कि अपनी बेटी को पढाती.. भेजने लगी उसे स्कूल सबके उपर से होकर.. उसको हंसाती खुद सारी रात रोकर.. उनकी हंसी भी जमाने को पसंद ना आई.. इंसानी भेड़ियों ने अपनी गंदी नजरें उस पे जमाई.. डरी डरी रहने लगी अब वो स्कूल आते जाते.. अचानक उठ जाती थी खाना खाते खाते.. जैसे तैसे उसने स्कूल पूरा कर लिया.. इसके बाद पैर काॅलेज में धर लिया.. सोचा था पढेगी लिखेगी आगे बढेगी.. अपनी मां के हर सपने को पूरा करेगी.. लेकिन हवस के दरिंदों ने उसे वहां भी नहीं छोड़ा.. उस फूल सी बेटी को एक एक ने निचोड...