मोबाईल
कितना अच्छा था सब, जब मोबाईल ना था..
किसी का ना कोई फैशन और कोई हेयरस्टाइल ना था..
अनजाने को तब यूं ही दोस्त बना लेते थे..
साथ बैठ कर सुख दुख की बतिया लेते थे..
खुशी की खबर घर जाकर सुनाकर आते थे..
एक साथ बैठकर खुशी के गीत गाते थे..
बड़े छोटे का लिहाज होता था..
आंखों में शर्म का ताज होता था..
बहन बेटी की हर कोई इज्जत करता था..
बाप की इज्जत खोने से हर युवा डरता था..
बड़े बड़े झगड़े भी आपस में पंचायत में सुलझाए जाते थे..
भूलकर सारे द्वेष एक दूसरे को गले लगाते थे..
शाम को चौपाल चबूतरों पे हुक्का गुड़गुड़ाता था..
एक बुजुर्गों का झुण्ड दिनभर की थकान भूलकर आपस में खिलखिलाता था..
देश सेवा का जज्बा हर युवा में होता था..
हर युवा सेना में भर्ती होने के सपने संजोता था..
छोटे बच्चों की तो एक अलग ही मस्ती होती थी..
संतरे की टाॅफी तब बहुत सस्ती होती थी..
इनकी टोली बहुत उधम मचाती थी..
अपने बच्चों को देख मां मंद मंद मुस्काती थी..
इनको अपनी मस्ती से मतलब था ना किसी की कोई परवाह थी..
सब चिंताओं से दूर इनकी एक अलग ही दुनिया थी..
जबसे मोबाईल आया सब कुछ बदल गया..
उस हंसती खेलती दुनिया का सूरज ही ढल गया..
छोटे छोटे बच्चों के हाथ में आज मोबाईल है..
फैशन तो फैशन अब हर हफ्ते बदलता इनका हेयरस्टाइल है..
मोबाईल आज आने जाने की रीत को खा गया..
किसी के पास वक्त नहीं है, ये कैसा जमाना आ गया..
रही सही कसर इस फेसबुक ने पुरी कर दी..
चौपाल चबूतरों की महफिलों की कमर तोड़ के रख दी..
अब महफिलें व्हाट्सएप फेसबुक पे सजती है..
हर किसी के पास ज्ञान की घंटियां बजती है..
वहां से शुरू हुई लड़ाई घरों तक आ जाती है..
भ्रष्ट तंत्र की व्यवस्था फिर उनको लूट के खा जाती है..
अदालत में मुकदमे चलते हैं फिर भी फैसले नहीं हो पाते..
इसी में फंसकर आज के युवा बर्बाद हो जाते..
दूसरे की छोड़ो, खुद की बहन बेटी की इज्जत का ना किसी को ख्याल है..
रेप छेड़खानी की खबरों से अखबारों का बुरा हाल है..
कुछ दिन ये भ्रष्ट राजनेता हो हल्ला मचाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं..
फिर खुद ही उन बलात्कारियों की पैरवी करके उन्हें बाइज्जत बरी करवाते हैं..
जिस उम्र में पहले स्कूल जाते थे, उस उम्र में आजकल के बच्चों के दिल टूट जाते हैं..
वफा का मतलब नहीं पता और गीत बेवफाई के गाते हैं..
'मनीष' तु भी बदल जा सब बदल गए..
मोबाईल की बदौलत सारे रिश्ते नाते जल गए..
किसी का ना कोई फैशन और कोई हेयरस्टाइल ना था..
अनजाने को तब यूं ही दोस्त बना लेते थे..
साथ बैठ कर सुख दुख की बतिया लेते थे..
खुशी की खबर घर जाकर सुनाकर आते थे..
एक साथ बैठकर खुशी के गीत गाते थे..
बड़े छोटे का लिहाज होता था..
आंखों में शर्म का ताज होता था..
बहन बेटी की हर कोई इज्जत करता था..
बाप की इज्जत खोने से हर युवा डरता था..
बड़े बड़े झगड़े भी आपस में पंचायत में सुलझाए जाते थे..
भूलकर सारे द्वेष एक दूसरे को गले लगाते थे..
शाम को चौपाल चबूतरों पे हुक्का गुड़गुड़ाता था..
एक बुजुर्गों का झुण्ड दिनभर की थकान भूलकर आपस में खिलखिलाता था..
देश सेवा का जज्बा हर युवा में होता था..
हर युवा सेना में भर्ती होने के सपने संजोता था..
छोटे बच्चों की तो एक अलग ही मस्ती होती थी..
संतरे की टाॅफी तब बहुत सस्ती होती थी..
इनकी टोली बहुत उधम मचाती थी..
अपने बच्चों को देख मां मंद मंद मुस्काती थी..
इनको अपनी मस्ती से मतलब था ना किसी की कोई परवाह थी..
सब चिंताओं से दूर इनकी एक अलग ही दुनिया थी..
जबसे मोबाईल आया सब कुछ बदल गया..
उस हंसती खेलती दुनिया का सूरज ही ढल गया..
छोटे छोटे बच्चों के हाथ में आज मोबाईल है..
फैशन तो फैशन अब हर हफ्ते बदलता इनका हेयरस्टाइल है..
मोबाईल आज आने जाने की रीत को खा गया..
किसी के पास वक्त नहीं है, ये कैसा जमाना आ गया..
रही सही कसर इस फेसबुक ने पुरी कर दी..
चौपाल चबूतरों की महफिलों की कमर तोड़ के रख दी..
अब महफिलें व्हाट्सएप फेसबुक पे सजती है..
हर किसी के पास ज्ञान की घंटियां बजती है..
वहां से शुरू हुई लड़ाई घरों तक आ जाती है..
भ्रष्ट तंत्र की व्यवस्था फिर उनको लूट के खा जाती है..
अदालत में मुकदमे चलते हैं फिर भी फैसले नहीं हो पाते..
इसी में फंसकर आज के युवा बर्बाद हो जाते..
दूसरे की छोड़ो, खुद की बहन बेटी की इज्जत का ना किसी को ख्याल है..
रेप छेड़खानी की खबरों से अखबारों का बुरा हाल है..
कुछ दिन ये भ्रष्ट राजनेता हो हल्ला मचाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं..
फिर खुद ही उन बलात्कारियों की पैरवी करके उन्हें बाइज्जत बरी करवाते हैं..
जिस उम्र में पहले स्कूल जाते थे, उस उम्र में आजकल के बच्चों के दिल टूट जाते हैं..
वफा का मतलब नहीं पता और गीत बेवफाई के गाते हैं..
'मनीष' तु भी बदल जा सब बदल गए..
मोबाईल की बदौलत सारे रिश्ते नाते जल गए..
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