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Showing posts from July, 2018

तेरी याद

आंखों में नमी दिल में उदासी छाई है.. आज फिर किसी की याद आई है.. आंखें ही आज बहुत कुछ कहना चाहती है.. उसकी आंखों के सामने रहना चाहती हैं.. आज "मनीष" फिर उन बाहों में रहना चाहता है.. अपने दिल की सब बातें उसको कहना चाहता है.. आज फिर उसके हाथों से परांठे खाने का मन कर रहा है.. दिल अपने पास बुलाने की जिद पर अड़ रहा है.. वो गुलाब का फूल फिर उसके हाथों में जाना चाहता है.. खुद को उसके सबसे पास पाना चाहता है.. याद आ रहा है तेरा वो साथ होने पर मुस्कुराना.. वो बिछड़ने के नाम से ही आंखों में पानी आ जाना.. वो RING फिर से उस उंगली को तरस रही है.. गुलाब की पंखुड़ियाँ तुझपे बरस रही है.. एक बार फिर से उन यादों को ताजा करने आ उसी ठिकाने पर.. चला दे आंखों से गोली मुझे रख के निशाने पर..

मां बाप और बेटी

बड़े लाड प्यार से पाला था उसे गोदी में खिलाया था.. मां ने अपनी बेटी को आगे बढ़ना सिखाया था.. कभी कंधे तो कभी पीठ पर झुलाया था.. बापू ने अपनी बेटी को मजबूत बनाया था.. उंगली पकड़कर चलना सिखाया.. बड़ी उम्मीद से उसको पढाया.. ज्यों ज्यों बेटी बड़ी होती जा रही थी.. मां बाप को उसके भविष्य की चिंता खा रही थी.. बेटी अब सयानी हो गई थी.. एक लड़के के सपनों की रानी हो गई थी.. दोनों एक दूसरे के प्यार में चूर हो गए थे.. सारे कालेज में लव बर्ड्स के नाम से मशहूर हो गए थे.. मां बाप तक भी ये खबर पहुंची तो दोनों हैरान रह गए.. बेटी की खुशी के लिए लड़के से मिलने की कह गए.. जब तहकीकात की लड़के कि तो पता चला वो लफंगा आवारा था.. लड़कियों की इज्जत से खेलने का उसका शौक न्यारा था.. बाप ने अब बेटी को बहुत समझाया.. लेकिन बेटी तो उसके प्यार में पागल थी उसे कुछ समझ ना आया.. एक रात वो उस लड़के के साथ घर से भाग गई.. मां बाप के माथे पर दे बदनामी का दाग गई.. 20 साल का प्यार 4 महीने के प्यार से हार गया.. उस मजबूर मां बाप को जीते जी मार गया.. अब मां बाप का मन समाज में होने वाली बदनामी को भांप गया.. ...

कुदरत के जज्बात

आज रात इतनी परेशान क्यों है.. रोशनी भी इतनी हैरान क्यों है.. सितारों में भी एक नमी सी है.. चांद में भी एक कमी सी है.. हवा ने भी खुद को शांत कर लिया है.. पंछियों ने भी आज मौन धर लिया है.. पानी में भी आज ठहराव सा है.. फूलों के दिलों में घाव सा है.. जुगनू आज जगमगा नहीं रहे.. कदम किसी के डगमगा नहीं रहे.. आज इस कुदरत को क्या हो गया है.. लगता है जैसे इसका भी कुछ खो गया है.. सब कुछ वीरान सा लग रहा है.. इंसान को छोड़कर हर कोई जग रहा है.. तालाब का पानी भी हिलोरें नहीं खा रहा.. शायद आज कुदरत से भी किसी का दुख देखा नहीं जा रहा.. एक पेड़ के नीचे तन्हा बैठा मैं ये सब देख रहा था.. रह रहकर तालाब में पत्थर फेंक रहा था.. पुछ बैठा मैं उस पेड़ से कि ये सब ऐसा क्यूँ कर रहे हैं.. क्या इनका भी कुछ खो गया है जो यूं मर रहे हैं.. पेड़ ना चाहते हुए भी रुंध गले से बोला.. क्यूँ हो गए हैं आज सब ऐसे इसका कारण खोला.. कि इंसान भले ही हमें भूल जाए पर भुलते नहीं हम.. अपने स्वार्थ की वजह से करता है हमारी कद्र कम.. अब ना कोई सितारों को गिनता है ना चांद को निहारता है.. आपसी दुश्मनी में भाई भाई को...