कुदरत के जज्बात

आज रात इतनी परेशान क्यों है..
रोशनी भी इतनी हैरान क्यों है..
सितारों में भी एक नमी सी है..
चांद में भी एक कमी सी है..
हवा ने भी खुद को शांत कर लिया है..
पंछियों ने भी आज मौन धर लिया है..
पानी में भी आज ठहराव सा है..
फूलों के दिलों में घाव सा है..
जुगनू आज जगमगा नहीं रहे..
कदम किसी के डगमगा नहीं रहे..
आज इस कुदरत को क्या हो गया है..
लगता है जैसे इसका भी कुछ खो गया है..
सब कुछ वीरान सा लग रहा है..
इंसान को छोड़कर हर कोई जग रहा है..
तालाब का पानी भी हिलोरें नहीं खा रहा..
शायद आज कुदरत से भी किसी का दुख देखा नहीं जा रहा..
एक पेड़ के नीचे तन्हा बैठा मैं ये सब देख रहा था..
रह रहकर तालाब में पत्थर फेंक रहा था..
पुछ बैठा मैं उस पेड़ से कि ये सब ऐसा क्यूँ कर रहे हैं..
क्या इनका भी कुछ खो गया है जो यूं मर रहे हैं..
पेड़ ना चाहते हुए भी रुंध गले से बोला..
क्यूँ हो गए हैं आज सब ऐसे इसका कारण खोला..
कि इंसान भले ही हमें भूल जाए पर भुलते नहीं हम..
अपने स्वार्थ की वजह से करता है हमारी कद्र कम..
अब ना कोई सितारों को गिनता है ना चांद को निहारता है..
आपसी दुश्मनी में भाई भाई को मारता है..
दिन रात का किसी को कोई ख्याल नहीं है..
हम से अब कोई पूछता हमारा हाल नहीं है..
हम से अब कोई बतियाता नहीं..
हाल अपने दिल का कोई सुनाता नहीं..
आज तुम आए हमारे पास तो पुराने दिन याद आ गए..
तुम्हें ऐसे तन्हा देखकर हम सब भी गम खा गए..
भले इंसानों ने तुम्हारे जज्बातों की कद्र ना की, तुम्हें अकेला छोड़ दिया..
हम सब तुम्हारे साथ हैं हमेशा, भले ही स्वार्थी इंसान ने हमें अंदर तक तोड़ दिया..
जो आए हो हमारे पास तो साथ निभाएंगे..
तुमने जो खोया है उसे वापस लाएंगे..
पेड़ की बात सुनकर मेरे रुके हुए आंसू बहने लगे..
कुदरत ही तेरे गम से वाकिफ है ऐसा कहने लगे..
कुदरत को भी पता है मैनें क्या खोया है..
"मनीष" आज तक तु बेवजह स्वार्थी इंसान के सामने रोया है..
अब ये बहारें ही मुझे मेरा खोया हुआ प्यार वापस दिलाएंगी..
उसको समझाकर वापस मेरे पास लाएंगी..



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