हर कोई मुझे बीच में क्यों छोड़ जाता है

हर कोई मुझे बीच में क्यों छोड़ जाता है

सारे रिश्ते नाते एक पल में तोड़ जाता है..
कोई क्यों किसी को बीच में छोड़ जाता है..
मैं भी ऐसे ही कई बार छोड़ा गया हूँ..
अपनों द्वारा कई बार तोड़ा गया हूँ..
शुरूआत पिताजी ने की हमें छोड़ने की..
20 जुलाई 2008 की वो मनहूस घड़ी थी हमें तोड़ने की..
बीच राह में छोड़ के खुद तो चल गए हमसे बहुत दूर.. 
खुद हंसते हुए गए हमें कर गए रोने पे मजबूर.. 
पिताजी के बाद अपनों ने भी छोड़ दिया साथ.. 
गिरते को बचाने के लिए नहीं दिया किसी ने हाथ.. 
खैर मां ने हमको गले से लगाया था.. 
पिताजी के बाद अपना हर सुख हम में ही पाया था.. 
जितना कर सकती थी उस से ज्यादा किया.. 
हमें जो चाहिए था तुरन्त ला कर दिया.. 
दुनिया बातें बनाती रहती थी.. 
बिन बाप के बेटों और विधवा मां को जली कटी सुनाती रहती थी.. 
सबकी सुन कर भी अनजान बनी रहती थी.. 
मेरी मां हमारे लिए ढाल बनी रहती थी.. 
दुनिया की सुन कर मैं पिसता रहता था.. 
रातों को एक झरना आंखों से रिसता रहता था.. 
रिश्तेदार भी छोड़ कर जा चुके थे.. 
वो पापा के मिले पैसों में से भी आधे खा चुके थे.. 
पैसे लेकर आना जाना छोड़ दिया.. 
पैसे वापस ना देने पड़े इसलिए रिश्ता तोड़ लिया.. 
मां ने फिर भी हमें टूटने ना दिया.. 
उम्मीद का दामन छुटने ना दिया.. 
हमें शहर ले आई मां उन खुदगर्जों से दूर..
वक्त के हाथों वो भी थी मजबूर.. 
पर अपनी मजबूरी को कभी हमारे सामने झलकने ना दिया.. 
हमारी आंख से एक भी आंसू टपकने ना दिया.. 
मेरा मन दुनिया के तानों से खिन्न था.. 
मैं और दो भाईयों से थोड़ा भिन्न था.. 
मैं अन्दर से बिल्कुल टूट गया था.. 
पढाई से भी मेरा मन उठ गया था.. 
बारहवीं भी ना हो पाई मैं बिल्कुल टूट गया.. 
कक्षा में अव्वल आने वाला मनीष कहीं पीछे छुट गया.. 
मोबाईल का जमाना आ गया था तो मैं भी जिद पे अड़ गया.. 
मैं भी मोबाइल लूंगा कहकर मां की गोद में पड़ गया.. 
मां तो मां होती है जिद के आगे हां बोल दी..
मैने भी लेके मोबाईल उसमें एक नई दुनिया खोल दी.. 
फेसबुक का जादू हर ओर छाया था.. 
मैं भी देखूं क्या बला है ये विचार मेरे मन में आया था.. 
उत्सुकतावश मैने भी फेसबुक पर आईडी बना ली.. 
मोबाईल के बाद दूसरी आफत गले लगा ली.. 
कोई भी किसी से भी कहीं भी इसमें कर लेता था बात.. 
हमने भी कई ना जानने वालों की ओर बढा दिया दोस्ती का हाथ.. 
फिर एक दिन एक लड़की से बात की.. 
उसने भाई के सम्बोधन से शुरूआत की.. 
खुद की कोई बहन नहीं थी इसलिए भावनाओं में बह गया.. 
उसको और उसकी दोस्त को मैं भी बहन कह गया.. 
चलो कुछ तो फायदा हुआ फेसबुक पर आने का.. 
मौका मिल गया हमें भी बहन बनाने का.. 
फिर शुरू हो गया बातों का सिलसिला.. 
मां को भी उनके सहारे कुछ वक्त खुशी का मिला.. 
फिर उस साल का रक्षाबंधन आया था.. 
नई बहनों से मिलने की खुशियां लाया था.. 
पहुंच गया मां के साथ बहनों के छात्रावास में.. 
राखी बंधवाने बहन के प्यार के अहसास में.. 
वक्त के साथ साथ एक बहन तो भूल गई.. 
शायद अपनों में जाकर हो मशगूल गई.. 
वक्त बीता दूसरी बहन की शादी आ गई.. 
दोनों घरों में खुशियां छा गई.. 
मैं व्यस्त था तो मैने बहन को बोला शायद ना आया जाए.. 
नासमझ ये बोली अगर ना आया तो कहीं फिर आके बहन की अर्थी उठाए.. 
पागल थी इसलिए मै समय से वहां था.. 
उस से मिलकर मैने उसे "congratulations" कहा था.. 
शादी धूमधाम से हो चुकी थी.. 
इसके बाद मेरी मां इस मुहबोली बेटी को भी खो चुकी थी.. 
शादी के कुछ महीनों बाद ही ये हाल था.. 
मुहबोले भाई और मां का इसे ना कोई ख्याल था.. 
ये भी बीच में भाई को छोड़ गई.. 
एक बार फिर से दिल को तोड़ गई.. 
इसके बाद कितने दोस्त बने टूटे.. 
कुछ अभी तक हैं साथ कुछ के साथ छुटे.. 
अब तो फेसबुक का खिलाड़ी हो गया था.. 
नई नई आईडी बनाकर अनाड़ी हो गया था.. 
एक आईडी में एक बार फिर से एक लड़की आई.. 
उस से बात करते हुए अपनेपन की झलक आई.. 
पुरी कार्टून थी हमेशा हंस के बतियाती थी.. 
पता नहीं कहाँ कहाँ से कैसी कैसी बातें ढुंढ के लाती थी.. 
मुझे भी उस से एक अजीब लगाव सा हो गया था.. 
भुलकर सारे गम उसकी बातों में खो गया था.. 
कहीं ये भी ना खो जाए इस बात से डरता था.. 
फेसबुक पे मैं अब बस उसका इंतजार करता था.. 
वक्त निकल रहा था हंसते हंसाते.. 
कार्टून के साथ मजे से गुनगुनाते.. 
18 दिसम्बर 2013 को कार्टून की एक दोस्त से शुरु की बात जो दूर हाॅस्टल में रहती थी.. 
दुखी थी बहुत हमेशा मरने को कहती थी.. 
मैने पुछा कारण तो उसने बहन की मौत बताया था.. 
बहुत लगाव था उस से ये जताया था.. 
मैने उसे समझाया मरते नहीं.. 
ये बुजदिलों वाले काम करते नहीं.. 
लाख कोशिशों के बाद उसे खुश कर पाया.. 
बोली मै उसकी जिन्दगी में खुशियां ले आया.. 
इसको खुश रखना है ये मैने भी ठान लिया.. 
उसको ही हमेशा के लिए जीवन संगिनी मान लिया.. 
धोखा खाया था उसने पहले इसलिए डर रही थी.. 
उसको यकीन दिलाया और वो तीसरे ही दिन मेरी मां से बात कर रही थी.. 
खुश थी अब वो मुस्कुराने लगी थी.. 
अपनी हंसी से मेरे दिल को चहकाने लगी थी.. 
फिर कार्टून को मैने जब ये बात बताई.. 
उसने मुझे आंखें दिखाई.. 
बोली मनीष ये तेरे लायक नहीं.. 
मैं बोला अब तो अपना मान लिया चाहे नालायक सही.. 
इसे हमेशा खुश रखूंगा लायक बनाऊंगा.. 
पहले इसे खिलाऊंगा फिर खुद खाऊंगा.. 
उस वक्त बात आई गई हो गई.. 
इसके बाद एक दिन कार्टून भी मुझसे अलग हो गई.. 
कहती थी तुझे कभी ब्लोक नहीं करुंगी वो ब्लोक कर गई.. 
एक बार फिर कोई बीच में छोड़ कर पराया कर गई.. 
लेकिन अब भी मेरे पास खुशियां तमाम थी.. 
कार्टून की वो दोस्त अब मेरी जान थी.. 
वो हमेशा हाॅस्टल मे माहौल से परेशान रहती थी.. 
मुझे नहीं रहना यहां बार बार कहती थी.. 
मैने उसका हौसला बनाए रखा.. 
उसको पढने के लिए वहां टिकाए रखा.. 
अब मुझे भी उसका सहारा था.. 
वो शख्स मुझे सारे जहाँ से प्यारा था.. 
वो कई बार भाग चलने की कहता था.. 
कहीं मैं भी दूर ना हो जाऊं उसे ये डर लगा रहता था.. 
मैने समझाया भाग के घरवालों की इज्जत पे दाग नहीं लगाएंगे.. 
दोनों लायक बनके घरवालों को शादी के लिए मनाएंगे.. 
उसके लिए फिर से पढने में मन लगाया.. 
पढने में मन नहीं लगा फिर भी जैसे तैसे डिप्लोमा उठाया.. 
अब बस एक ही ख्वाब था कि हम हमेशा के लिए साथ हो जाएं.. 
दोनों रहे हमेशा साथ ना हमारे बीच में कोई आए.. 
हंसते हंसाते रोते रुलाते लड़ते झगड़ते चार साल निकल गए.. 
प्यार कम होने के बजाय हमेशा बढा और हम और ज्यादा मिल गए.. 
एक थे अब हम दो की बजाय.. 
अब हमें कोई अलग ना करने पाए.. 
लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली वो भी बदल गया.. 
हमारे प्यार का उगता सूरज ढल गया.. 
बहुत बार दिल तुड़वा लिया मनीष अब और ना सह पाऊंगा.. 
अब वो जा रहा है दूर तो मैं भी मर जाऊंगा.. 








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