कोई ना कोई

ना शिकवा ना पहचान ना जान है कोई..
फिर भी बेवजह परेशान है कोई..
ना कलम ना खत ना किताब है कोई..
फिर भी मनीष को पढने को बेताब है कोई..
ना घोड़ा ना गाड़ी ना कार है कोई..
फिर से साथ पैदल चलने को तैयार है कोई..
ना हवा ना पानी ना हसीन शमा है कोई..
फिर भी भक्ति में रमा है कोई..
ना रंग ना रुप ना साज है कोई..
फिर भी छुपा रखा गहरा राज है कोई..
ना चांद ना रोशनी ना चकोर है कोई..
फिर भी बांधे हुए डोर है कोई..
ना परसों ना आज ना कल है कोई..
लग रहा साथ हर पल है कोई..
ना धरती ना सूरज ना गगन है कोई..
किसी और के ख्यालों में मगन है कोई..
ना हम में ना तुम में ना उस में है कोई..
हर तरफ हर जगह हर क्षण में है कोई.. 

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