मैं बहुत बदतमीज हूँ

 कोई मुझे भी सीखा दे सलीका ए जिंदगी
कि मैं बहुत बदतमीज हूँ।
बिना नाप के ही सिल दिया हो किसी दर्जी ने
कि मैं वो अधूरी सी कमीज हूँ।
जो जैसा है उस से
वैसे ही पेश आता हूँ।
जी हाँ जनाब
मैं भी दो वक्त खाना खाता हूँ।
जिसे खाकर आ जाए आनंद
कि मैं वो व्यंजन लजीज हूँ।
कोई मुझे भी सीखा दे सलीका ए जिंदगी
कि मैं बहुत बदतमीज हूँ।
किसी का फालतू का प्रवचन
जैसे मुझे सुनना आता ही नहीं।
कोई खुद से ज्यादा समझदार
आजकल किसी को पाता ही नही।
जिसे खुद के गुरुर से है प्यार
कि मैं ही वो इश्क का मरीज हूँ।
कोई मुझे भी सीखा दे सलीका ए जिंदगी
कि मैं बहुत बदतमीज हूँ ।
ना मंदिर में जाता हूँ,
ना मस्जिद में सिर झुकाता हूँ।
हालात से लड़ते लोगों से
अक्सर सीखता जाता हूँ।
सीखा जिसने जिंदगी की ठोकरों से
मैं ही वो नाचीज़ हूँ।
कोई मुझे भी सीखा दे सलीका ए जिंदगी
कि मैं बहुत बदतमीज हूँ ।
कोई बदनाम करता है,
कोई शाबाशी देता है।
कोई जान छिड़कता है,
कोई जान ही ले लेता है।
कहते हैं जिसे प्यार से 'मनीष' सभी
हां मैं ही वो हरदिल अजीज हूँ।
कोई मुझे भी सीखा दे सलीका ए जिंदगी
कि मैं बहुत बदतमीज हूँ ।

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