अंजाम ए इश्क : गजल
कैसे बदनाम कर दूं मोहब्बत को,
इल्जाम मुझ पर भी आएगा..
कैसे बेवफा कह दूं उसे,
प्यार बदनाम हो जाएगा..
जरूर कोई मजबूरी होगी उसकी बेवफाई की..
गर उसे मैं ना समझूं तो,
वादा बेनाम हो जाएगा..
कोशिश की होगी उसने भी जुदा ना होने की,
मगर जुदाई ना हो तो,
किस्सा ना सरेआम हो पाएगा..
बेमानी होगी उसकी कसमों के साथ,
गर कसमें निभा दे तो,
खिलाफ परिवार हो जाएगा..
मनीष को छोड़कर दुख तो उसे भी हुआ होगा,
मगर कैसे हो सकता है ये कि,
सदियों बाद कोई प्यार मुकम्मल हो जाएगा..
इल्जाम मुझ पर भी आएगा..
कैसे बेवफा कह दूं उसे,
प्यार बदनाम हो जाएगा..
जरूर कोई मजबूरी होगी उसकी बेवफाई की..
गर उसे मैं ना समझूं तो,
वादा बेनाम हो जाएगा..
कोशिश की होगी उसने भी जुदा ना होने की,
मगर जुदाई ना हो तो,
किस्सा ना सरेआम हो पाएगा..
बेमानी होगी उसकी कसमों के साथ,
गर कसमें निभा दे तो,
खिलाफ परिवार हो जाएगा..
मनीष को छोड़कर दुख तो उसे भी हुआ होगा,
मगर कैसे हो सकता है ये कि,
सदियों बाद कोई प्यार मुकम्मल हो जाएगा..
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