जिंदगी मौत की कहानी

एक किस्सा पुराना दोहराता हूँ..
जिंदगी और मौत की नोक झोंक सुनाता हूँ..
दो बहनों की ये कहानी है..
है थोड़ी अलग मगर जानी पहचानी है..
था एक हस्पताल श्मशान के पास..
एक शांत रात थी बहुत उदास..
एक बहन 'जिंदगी' का हस्पताल में ठिकाना था..
तो दूसरी 'मौत' का घर श्मशान विराना था..
उस रात दोनों का बहन प्रेम जाग उठा..
मिलने को एक दूसरी से बावरा मन भाग उठा..
निकल पड़ी दोनों अपने ठिकानो से..
हो बेखबर दुनियादारी के कानों से..
हस्पताल में एक मरीज वेंटिलेटर पर कराह रहा था..
जिंदगी से पीछा छुड़ाने के लिए मौत को बुला रहा था..
दोनों बहनों के मिलने का ये सही ठिकाना था..
दोनों को कुछ समय साथ जो बिताना था..
पहुंची मौत वहां मरीज की करुण पुकार सुनकर..
जिंदगी भी आई वहां थोड़ा सा तनकर..
आते ही दोनों ने मिलने की खुशी जताई..
पर चाहकर भी एक दूसरे को ना गले लगा पाई..
दोनों की आंखों में था एक ही ख्याल..
आंखों आंखों में पूछा एक दूजे का हाल..
तभी जिंदगी ने कहा इतराकर..
थोड़ी आंखे फैलाकर और थोड़ा मुस्कुराकर..
मेरे तो मजे हैं शान से रहती हूँ..
सब मुझे चाहते हैं सबके दिलों में रहती हूँ..
इस पर मौत थोड़ी मुस्कुराई और बोली..
जिंदगी की एक एक पोल खोली..
तुझमें सुख है तो दुख भी अपार है..
एक तुझमे ही जिम्मेदारियों का भार है..
और फिर एक दिन छोड़ देती है तु सबका साथ भी..
नहीं देती फिर पकड़ने को उसको अपना हाथ भी..
मुझे देख जिसको मिलती हूँ पूरा साथ निभाती हूँ..
व्यर्थ की चिंताओं और दुखों से सबको मुक्त कराती हूँ..
जो तुझसे दुखी होता है वो मेरी तमन्ना करता है..
तेरे दुखों से तंग आकर ही इंसान आत्मदाह करता है..
कभी सुना है कोई मुझसे दुखी हो तेरे पास आया हो..
मेरे आगोश से दुखी होकर कभी तेरा दरवाजा खटखटाया हो..
इतना सुनकर जिंदगी की आंखों भीग गई..
अपनी सच्चाई से वाकिफ हो वो नया सबक सीख गई..
अब वेंटिलेटर पर पड़ा मरीज फिर से करहाया..
उसकी कराह सुन दोनों बहनों को वर्तमान का होश आया..
जिंदगी ने कहा 'बहन इसको भी मुक्ति दिला दे'..
मै छोड़ रही हूँ इसको अब तू खुद से मिला दे..
अब मैं चलकर थोड़ा 'मनीष' को सताती हूँ..
बहुत अच्छा लिखता है एक दिन उसको भी तुझसे मिलवाती हूँ..
बस इतनी सी जिंदगी और मौत की कहानी थी..
सब सुनी सुनाई और थोड़ी पुरानी थी.. 

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