40 दिन का जहर

   40 दिन का जहर

2 अप्रैल का दिन ऐसा आया था..
जिसने मुझे अन्दर तक हिलाया था..
मन में एक नया उत्साह था..
नई नई नौकरी का चाह था..
घर से निकला था एक नए रंग के साथ..
अपनों से दूर जाने के गम के साथ..
एक अपना ऐसा भी था जो मेरे साथ था..
दूर होने पर भी जिसके हाथों में हाथ होने का अहसास था..
जैसे तैसे कुछ वक्त फिसल गया..
उस एक अपने के सहारे एक सप्ताह निकल गया..
फिर वो दिन आया..
जो मेरी जिंदगी में तुफान लाया..
एक ऐसा तुफान जिसने ना कोई शोर मचाया..
लेकिन मेरी जिंदगी में कोहराम घनघोर मचाया..
उस अपने के हाथों से हाथ छुटता दिखाई दे रहा था..
और वक्त एक नासमझ सी करवट ले रहा था..
गलती मेरी थी मैं कुछ ज्यादा बोल गया..
उसकी हालत देखे बिना नासमझी में मुह खोल गया..
मैं सप्ताह बाद घर पे था..
मगर ध्यान अभी भी उस अपने में था..
बराबर गुरुर दोनों ओर था..
जिसका ना कहीं शोर था..
ना वो बोला ना मैने बोलने की जहमत उठाई..
बस यहीं से मैने अपनी सारी खुशियां गंवाई..
दोनों तरफ दिल में उथल पुथल चल रही थी..
एक दूसरे की कमी दोनों तरफ खल रही थी..
अब मुझपे दोहरी मार थी..
एक तरफ उसकी कमी दूसरी तरफ नौकरी की उलझनों की भरमार थी..
नौकरी में परेशान इतना हो गया था..
मैं एक दूसरी ही दुनिया में खो गया था..
दूसरी तरफ उसका भी बुरा हाल है..
उसने कुछ ऐसा किया जिसका मुझे हमेशा के लिए मलाल है..
खैर ना खाया जा रहा था ढंग से ना पिया जा रहा था..
उसकी याद में रो रो के जिया जा रहा था..
कई कई रातों तक ना सोया हूँ..
उसके लिए रातों को उठ उठ के रोया हूँ..
लेकिन एक गुरूर दोनों को रोके हुए था..
दोनों के सही होने के फैसले को ठोके हुए था..
ठीक से ना खाने पीने और सोने की वजह से बुरा हाल था..
मन में फिर भी उस अपने का ही ख्याल था..
तंग आकर नौकरी छोड़ चुका था..
वहां से सारे जुड़ाव तोड़ चुका था..
हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी..
एक उलझन मुझे अन्दर ही अन्दर खा रही थी..
खैर दो दिन निकाले बिमारी से तड़पते हुए..
तीसरे दिन हिम्मत भी हार चुकी थी बिमारी से लड़ते हुए..
मौत के कगार पे खड़ा था..
हौसला फिर भी उस अपने का बहुत बड़ा था..
सारा शरीर काला पड़ गया था एकदम..
आंखों के आगे अन्धेरा था और चलने में साथ नहीं दे रहे थे कदम..
जैसे तैसे सामान समेट के भाग आया..
पानी के सहारे खुद को घर पकड़ाया..
बुखार से शरीर तप रहा था..
मैं धीरे धीरे खप रहा था..
दो दिन बाद घर आकर थोड़ी खिचड़ी खाई थी..
मां से कहकर माथे पे ठण्डे पानी की पट्टी रखवाई थी..
शाम को गया डाक्टर के पास तो उसने अन्दर 103° बुखार बताया था..
फिर एक इंजेक्शन लगा कर दो बोतल ग्लूकोज चढाया था..
2 दिन में बुखार में तो आराम था..
लेकिन शरीर सूज गया तमाम था..
एलर्जी सारे शरीर को पकड़े हुए थी..
एक अजीब सी ताकत सिर को जकड़े हुए थी..
फिर एलर्जी की दवाई लेके आया था..
3 दिन बाद शरीर में कुछ आराम आया था..
टूटकर फिर उस अपने को फिर से ऐसा कुछ बोल दिया..
अपनी बर्बादी का रास्ता अपने लिए खोल दिया..
लेकिन अपना तो बहुत दूर जा चुका था..
मेरे लिए 26 गोलियां एक साथ खा चुका था..
पत्थर सा हो गया था इतना सब सह के..
छोड़ गया मुझे "भूल जाओ मुझे" कह के..
ये 40 दिन मेरी जिन्दगी में कहर थे..
मुझे बर्बाद करने का जहर थे..
अब मुझे गलती का अहसास हो रहा था..
बेवजह के गुरूर में मैं उस अपने को खो रहा था..
लेकिन फिर भी अपने प्यार पे इतना भरोसा था..
इसलिए खुद को मैने बहुत ज्यादा कोसा था..
रो रो कर अब मेरा बुरा हाल है..
लेकिन उसे ना किसी का कोई ख्याल है..
रह रह कर मन में उठ रही है टीस..
तु सच में बहुत बेकार है 'मनीष'..
एक भरोसा प्यार पे अब भी है कि वो आएगा..
मुझे अपना कहकर गले से लगाएगा..

LOVE YOU A LOT
PLEASE COME BACK

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

तेरा साथ

हर कोई मुझे बीच में क्यों छोड़ जाता है

अदा